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बुधवार, 25 दिसंबर 2013

जोगी को गुस्सा क्यों आता है...


अपने परिवार के राजनैतिक राह का फैसला सोनिया-राहुल गांधी के द्वारा करने का दावा करने वाले प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री अजीत प्रमोद कुमार जोगी के लोकसभा चुनाव नहीं लडऩे की घोषणा कर कांग्रेस की राजनीति में एक बार फिर हलचल मचा दी है।
नये प्रदेशाध्यक्ष भूपेश बघेल की ताजपोशी की खबर के साथ ही आये अजीत जोगी के इस फैसले के मायने आसानी से इसलिए भी लगाये जा रहे है क्योंकि भूपेश बघेल को धुर जोगी विरोधी माना जाता है।  विधानसभा चुनाव की टिकिट को लेकर अजीत जोगी के तेवर किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में भूपेश बघेल के पदभार ग्रहण और उससे पहले स्वागत के कार्यक्रम से जोगी परिवार की दूरी ही चर्चा का विषय नहीं है बल्कि चर्चा का विषय तो उनके लिए आसानी से उपलब्ध सरकारी विमान भी है। इस बात में जरा भी संदेह नहीं है कि छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी राजनीति में जोगी के मुकाबले कोई नेता नहीं है और यही वजह है कि अब लोग मजाक में भी यह करने लगे हैं कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सत्ता में वापसी तब तक नहीं होगी जब तक अमित जोगी मुख्यमंत्री पद के लिए तैयार नहीं हो जाते। इस मजाक के मायने आसानी से लगाये जा सकते हैं। लेकिन पिछले तीन चुनाव में कांग्रेस की हार की जितनी भी समीक्षा हुई उसमें अजीत जोगी चर्चा के केन्द्र में रहे हैं। विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव कांग्रेस को जिस तरह से हार का मुंह देखना पड़ रहा है उसमें गुटबाजी ही प्रमुख वजह रही है और लगता है कांग्रेस के दिग्गज माने जाने वाले नेता लगातार पराजय के बाद भी सबक लेने को तैयार नहीं है। अजीत जोगी के प्रभाव वाले आरक्षित सीटों में कांग्रेस की हार को लेकर जिस तरह से जोगी निशाने में है उसके बाद भी अब कांग्रेस उसकी परवाह करे यह संभव नहीं दिख रहा है और यही वजह है कि प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति की। खबर से अजीत जोगी भले ही एतराज नहीं कर पाये लेकिन चुनाव नहींं लडऩे की घोषणा नाखुशी जाहिर करने का माध्यम माना जा रहा है।
सत्ता में वापसी की आस में बैठी कांग्रेस के लिए चुनाव परिणाम जितना दुखद माना जा रहा है उससे ज्यादा परिणाम को लेकर आ रही खबरें दुखद है। पार्टी के ही नेताओं के द्वारा जिस पैमाने पर भीतरघात हुआ उससे तो इस तरह के परिणाम पहले से ही तय थे। अजीत जोगी ने चुनाव नहीं लडऩे की घोषणा का भले ही जो कारण बताये हो पर सच तो यही है कि यह एक तरह का गुस्से के सिवाय कुछ नही है जो दबाव की राजनीति का हिस्सा माना जाता है अब देखना है कि वे सरकारी विमान के सफर पर ज्यादा यकीन करते हैं या हाईकमान के निर्णय का...।

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

तेजपाल के बहाने...


इस पत्रकारिता पर एक और धब्बा कहें या क्या कहें, पर पत्रकारिता को लेकर पिछले दशक भर से चल रही चर्चा में तहलका के संपादक तरूण तेजपाल कांड ने इस मिशन को फिर घेरे में लिया है।
तरूण तेजपाल ने जिस तरह की पत्रकारिता की थी उसमें का यह नि:संदेह निदंनीय है। जो लोग समाज में आईना है इन दिनों उन पर सबकी निगाह है ऐसे में उनके चरित्र और व्यवहार में नैतिकता होनी ही चाहिए।
छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का अपना एक इतिहास है। माधव राव सप्रे से लेकर ऐसे कितने ही नाम है जो पत्रकारिता की स्वच्छता के लिए आज भी संघर्ष कर रहे हैं। जिनका ध्येय सिर्फ लोगों तक खबरें परोसना ही नहीं है बल्कि समाज को कुरुतियों को दूर भगाना भी है। तरूण तेजपाल के मामले में भी न्याय होगा लेकिन हम उम्मीद करते है कि छत्तीसगढ़ में बैठे बड़े अखबार समूह पत्रकारिता को लेकर न केवल गंभीर होंगे बल्कि इसे कलंकित होने के किसी भी खबरों से दूर रखेंगे।
यह सच है कि बड़े बड़े समूहों ने सरकारी सुविधा जुटाने तिकड़म किया हो। सरकारी विज्ञापनों के लिए सरकार की तिमारदारी की हो पर छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता आज भी गौरवशाली है तो इसकी वजह यहां के पत्रकार है जिन्होंने तमाम अवरोधों के बाद भी खबरों से समझौता नहीं किया। ताकत पर नौकरशाह और ताकतवर सरकार के खिलाफ लिखने से गुरेज नहीं किया और यह आगे भी जारी रहेगा।
छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में भी महिला पत्रकारों की कमी नहीं रही है। शशि परगनिहा, रत्ना वर्मा से लेकर ऐसे कितने ही नाम है जिन्होंने समय समय पर अपनी खबरो से हलचल मचाई है और अब तो प्राय: हर अखबार व न्यूज चैनलों के दफ्तरों में महिला पत्रकार देखे जा सकते हैं। उन पर दबाव का अंदेशा भी होता है। ऐसे में शोमा चौधरी, जैसे तेजपाल के सहयोगियों की भी कमी नहीं होगी लेकिन इस सबके बाद भी प्रबंधन को तय करना होगा कि वह ऐसी घटना पर सतर्क रहे ताकि पत्रकारिता पर कोई आंच न आये।
जिस तरह से अखबार समूह को अधिकाधिक धन कमाने की लालसा है कैसा ही आम लोगों की उम्मीद भी बढ़ी हुई है और आज का युवा तो सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल कर खबरों का खुलासा कर ही देता है इसलिए बेवजह खबरें छुपाकर स्वयं को बदनाम करने की प्रवृत्ति से भी बचना चाहिए। तहलका के तरूण तेजपाल ने जिस तेजी से अपनी जगह बनाई थी उतनी तेजी सभी चाहते है पर यह ध्यान रहे कि आप जब सबका आईना बनते हो तो आईने में दाग का भी ध्यान रखे क्योंकि नैतिकता की दुहाई तभी अच्छी लगती है जब आप स्वयं नैतिकता पर चल रहे है। अन्यथा तरूण तेजपाल बनने में समय नहीं लगता।

सोमवार, 30 सितंबर 2013

पुलिसिया मनमानी पर सरकार की चुप्पी..!


छत्तीसगढ़ में पुलिस की मनमानी पर सरकार की नहीं चलती, शराब ठेकेदार, माफिया और राजनैतिक दबाव की आड़ में पुलिस कानून का मजाक बना रही है और गृह मंत्री ननकी राम कंवर कार्रवाई की बजाय बतोले बाजी में लगे हैं। मुख्यमंत्री से लेकर राजधानी के दो-दो मंत्रियों के रहते थानेदारों की करतूत चरम पर है7 आम लोगों का जीना दूभर होने लगा हे और अपराधिक तत्वों के हौसले बुलंद है।
दहेज मामले में बिना काऊसिंलिग के सीधे एफ आई आर दर्ज करने थाने में बिढाने के मामले में जब एएसपी श्वेता सिन्हा कहती है कि पुलिस के पास अधिकार है तो समझा जा सकता है कि वह क कहना चाह रही है।
ऐसा नहीं है कि पुलिसिया करतूत का यह पहला मामला है। पंडरी, मोवा, से लेकर गुढिय़ारी उरला तक पुलिस वालों का यही हाल है वर्दी के धौंस से आम आदमी का खून चूसने की कोशिश में लगी राजधानी पुलिस पर रिपोर्ट कर्ताओं से बदसलूकी, अपराधियों से सांठ-गांठ के ढेरो मामले हैं।
छत्तीसगढ़ पुलिस के बारे में गृहमंत्री ननकीराम कंवर का विधानसभा में यह कहना कि दस-दस हजार रूपये में शराब ठेकेदारों के हाथों थाने बिक रहे हैं समझा जा सकताह ै कि भाजपा राज का यह केसा सुराज है। गृहमंत्री ने एस पी को निकम्मा और कलेक्टर को दलाल तक का तमगा दिया है।
लेकिन प्रदेश के कथित साफ छवि वाले मुखिया को यह सब नहीं दिखता। नहीं दिखता तो शहर के मंत्रियों और जनप्रतिनिधि को भी लेकिन कोई कुछ नहीं कह रहा है।
जैनमूर्ति चोरी कांड हो या डाल्फिन स्कूल के संचालक राजेश शर्मा, सदर के सेठ मन्नू नत्थानी का मामला हो या मौदाहापारा में पुलिस वालों की भरपुर पिटाईका मामला हो। जनप्रतिनिधियों को कुछ नहीं दिखता। त्यौहारी सीजन से लेकर महिने के आखरी में यातायात के नाम पर वसूली का मामला हो जनप्रतिनिधि खामोश है।
पुलिसिया आतंक को सरकार का इस तरह से समर्थन और अपराधियों को संरक्षण ने राजधानी को अपराध गढ़ बना दिया है। विवदास्पद पुलिस वालों को संविदा देकर सरकार ने क्यया साबित किया है वह तो वही जाने लेकिन राजधानी के एस पी ओपी पॉल का 6 माह की छूट्टी का आवेदन यह साबित करने के लिए काफी है कि भाजपा सरकार की मंशा क्या है।
बिलासपुर के तत्कालीन एसपी राहुल शर्मा के अपराधी क्यों छुट्टी घूम रहे हैं और जब सत्ता में नहीं थी तब जिन पुलिस वालों का जुलूस निकालकर कार्रवाई की मांग की जा रही थी वे पुलिस वाले क्यों महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हैं यह समझा जा सकता है।
अपराध गढ में तब्दिल होते राजधानी में पुलिसिया व्यवहार को लेकर अधिकारियों का प्रवचन सतत जारी है लेकिन महिना वसूलने में माहिर थाने दारों पर कार्रवाई की बजाय कमीशन लेने की परम्परा ने इस शांत प्रदेश को अशांत जरूर कर दिया है।

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

सांप-छुछुंदर का खेल...


छत्तीसगढ़ में हो रहे विधानसभा चुनाव में भले ही कांगे्रस और भाजपा सत्ता के लिए जोड़ तोड़ में लग गये हो पर सच तो यह है कि दोनों ही दलों के लिए राह आसान नहीं है। स्वाभिमान मंच की बढ़ती ताकत से उन्हें भीतर तक हिला दिया है। सत्ता के लिए जादुई आंकड़े 46 पाना न तो भाजपा के लिए आसान है और न ही कांग्रेस के लिए ही आसान है।
प्रदेश के मुखिया रमन सिंह के लिए मुश्किल तभी से शुरू हो गया था जब भटगांव कोल ब्लॉक की कालिख भाजपा के तत्कालिन अध्यक्ष नीतिन गडकरी के चहेते संचेती ब्रदर्स के जटिये उन तक पहुंचने लगा था। भाजपा भले ही अपने मुखिया को साफ सुधरा बताये लेकिन कोल ब्लॉक कालिख से वह बच नहीं सकी है। रोगदा बांध एक उद्योग को बेचने के मामले में भी वह जनता के सामने निरूत्तर है जबकि इंदिरा बैंक घोटाले की नार्को सीडी ने तो सरकार के सभी दमदार मंत्रियों पर कालिख पो ही दी। भले ही सरकार हैट्रिक के सपने देख रही हो। सुराज से लेकर विकास का दावा कर रही हो पर सच तो यह है कि प्रशासनिक आतंक और भ्रष्टाचार से आम आदमी त्रस्त है।
किसानों की जमीनों को लेकर सरकार के दो मुंहे रवैये से जहां किसान नाराज है यहीं आरक्षण कटौति को लेकर सतनामी समाज की नाराजगी खुलकर सामने आ गई है। भाजपा की गुटबाजी भी सतह तक पहुंच गई है ऐसे में सिर्फ नरेन्द्र मोदी के सहारे सत्ता का सपना कैसे पूरा होगा कहना कठिन है।
कांग्रेस की गुटबाजी और अंर्तकलह के चलते कांग्रेस की राह भी मुश्किल हो गई है। उपर से रमन सरकार से नूरा कुश्ती और सेंटिंग की खबर ने आम कार्यकर्ताओं को हताशा के सिवाय कुछ नहीं मिल रहा है। जीरम घाटी से लेकर नार्को सीडी और संचेती से लेकर अदानी ग्रुप के मामले में कांग्रेस आक्रामक होने से बाचती रही है। अपनी सीट के चक्कर में सरकार से सौदे की खबर ने छोटे व नये टिकिटार्थीयों की राह कठिन कर दिया है। हालत यह है कि जोगी-वोरा-महंत, चौबे और न जाने कितने गुटों में बंटी कांग्रेस सरकार के करतुतों पर जुबान खोलने की बजाय आपस में ही विष दमन में मशगुल है।
भाजपा और कांग्रेस क इसी करतुत के चलते छत्तीसगढ़ में तीसरी ताकत को समर्थन मिलने लगा है। पहले से ही दो सीटों पर कब्जा जमाने वाली बसपा ही नहीं स्वाभिमान मंच को भी लोगों को जबरदस्त समर्थन मिलने लगा है। स्वाभिमान मंच का दावा है कि सत्ता की चाबी उसके पास ही रहेगी और वह कांग्रेस भाजपा को 30-30 सीटों से आगे नहीं बढऩे देगी ऐसे में बसपा ने भी अपनी सीटें बढ़ा ली तो कांग्रेस भाजपा की राह कठिन हो जायेगी।
वैसे भी जिस तरह से आरटीआई कानून, अपराधियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस और भाजपा ने एका दिखाई है उससे नये राजनैतिक हालात बन रहे है। अब तो आम लोग भी कहने लगे है चोर-चोर मौसेटे भाई...!

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

सत्ता का दंभ


कहते है सत्ता आदमी को पागल कर देता है तो किसी को इतना दंभी बना देता है कि वह अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझता । आजकल छत्तीसगढ़ में यही सब हो रहा है । सत्ता का असर कई भाजपाईयों में परवान चडऩे लगा है । कुर्सी पाते ही अनाप-शनाप कमाई के फेर में पड़े भाजपाईयों के लिए कानून व्यवस्था खेल बन कर रह गया है । हर हाल में पैसा कमाने की होड़ मची हुई है । और अदना सा कार्यकर्ता भी नियम कानून को हाथ में लेने से परहेज नहीं करता ।
यही वजह है कि पिछले दिनों राजनांदगांव के सांसद मधुसूदन यादव के प्रतिनिधि ने खनिज इंस्पेक्टर की सिर्फ इसलिए अपहरण कर पिटाई की क्योंकि उसने उसने अवैध खनिज परिवहन को पकड़ा था । ऐसा नहीं है कि सत्ता के दंभ पर किसी भाजपाईयों ने पहली बार ऐसा किया हो इससे पहले भी भाजपाई घपले बाजी को पकडऩे वाले अधिकारियों के साथ सार्वजनिक दुव्र्यवहार होता रहा है । चर्चा है कि शशिमोहन सिंह जैसे पुलिस अधिकारी के साथ तो एक मंत्री ने सीएम हाऊस में ही सिर्फ इसलिए दुव्र्यवहार किया था क्योंकि उन्होंने मिठाई में नकली खोवा मिलाने वाले एक भाजपाई के गिरेबान में हाथ डाल दिया था ।
सत्ता के दंभ का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि राजधानी के कई नामी-गिरामी अपराधी बड़े-बड़े मंत्रियों के नाक के बाल बने हुए है । जिस प्रदीप गांधी को संसद में सवाल पूछने के एवज में बर्खास्त कर दिया गया हो वह मुख्यमंत्री के साथ कार्यक्रमों में हिस्सा ले और पार्टी में महत्वपूर्ण ओहदा दिया जाए सत्ता का दंभ नही तो और क्या है ।
ऐसा नहीं है कि सत्ता का दंभ केवल भाजपा में ही दिखाई पड़ता है क्रंाग्रेस में भी यही स्थिति है । बड़े पदों पर बैठे नेता अपने पद का प्रभाव बखूबी दिखाते है और ऐसे लोगों से गलबहियां करने से परहेज नहीं करते जिसकी वजह से पार्टी की छवि खराब हो सकती है ।
लेकिन आज छत्तीसगढ़ में सत्ता में भाजपा बैठी है इसलिए हम केवल इसी पर चर्चा कर रहे हैं क्रंाग्रेस के दंभ की चर्चा फिर कभी किया जायेगा ।
सत्ता के दंभ की वजह से ही छत्तीसगढ़ में राजनैतिक सूचिता को जमींदोज किया गया और प्रशासनिक आतंकवाद के आरोपों को सिरे से नकार दिया जाता है । रोगदा बांध बेचे जाने के मामले को बहुमत के आधार पर किलन चिट देना या 49 प्रतिशत शेयर के बाद भी संचेती की कंपनी को एम डी का पद देना क्या सत्ता का दंभ नहीं है । भ्रष्ट लोगों को संविदा देकर नौकरी पर वापस रखना और ईमानदारों को प्रताडि़त करना भी सत्ता का दंभी प्रवृति है । छत्तीसगढ़ में यह चरम पर है । कई अधिकारी आत्महत्या जैसे कदम उस चुके है जबकि कई अधिकारी छत्तीसगढ़ से चले जाने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं ।
आखिर चुनावी साल में सरकार क्या साबित करना चाहती है यह तो वही जान लेकिन सत्ता का दंभ कभी भी लंबे समय तक नहीं चला है । खासकर छत्तीसगढ़ के शांत प्रिय जनता को यह कभी रास नहीं आया हे । सत्ता के दम पर अपनी दूकान चलाने वालों को जनता ने ऐसा मजा चखाया है कि वे आज भी इससे उबर नहीं पाये हैं ।
इसी प्रदेश में ऐसे कई कांग्रेसी हैं जिनकी एक जमाने में तूती बोलती थी लेकिन आज वे अपना चुनाव तक नहीं जीत पाते । हम याद दिलाया चाहते हैं कि जब रावण का दंभ नहीं टिक पाया तो फिर किसका दंभ टिक पायेगा । यदि भाजपा वास्तव में हैट्रिक करना चाहती है तो उसे ऐसे दंभी लोगों को किनारे करना होगा । सत्ता का दंभ पर मनमानी को कोई बर्दाश्त नहीं करता और कालिख पूते चेहरे कभी भी अच्छे नहीं लगते । भले ही अपना प्रोडक्ट बेचने दाग अच्छे है का थीम हिट हो जाए लेकिन दाग कभी अच्छे नहीं लगते । यह कटु सच्चाई है और इसे नजर अंदाज नहीं किया जाना चाहिए ।